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वर्षा अनुमान

भारतवर्ष में ज्योतिष के आधार पर वर्षा के अनुमान लगाए जाने की पद्धति सैक़डों वर्षो से प्रचलन में है। नक्षत्रों, राशियों, ग्रहों और कुछ अन्य तथ्यों पर आधारित अनेक पद्धतियां अत्यधिक सफल है और मौसम विज्ञानियों को आज भी चुनौती देने में सक्षम है। बादलों का प्रकार व उनसे किस भांति की वर्षा होगी। रोहिणी वास, सप्तऩाडी चक्र, वायु परीक्षण, ग्रहों के उदय, अस्त व वक्री होने के फल। ग्रहों का वीथि गमन जैसे अनेकों प्रकरण ऎसे हैं जो वर्षा का समय निर्धारण करते हैं। और सुभिक्ष या दुर्भिक्ष की सूचना देते हैं। संवत्सर का प्रकार, ग्रहों के रंग-रूप, उल्कापात, केतु चार, चन्द्र-शृंग इत्यादि ऎसे कितने ही प्रकरण हैं, जिनसे वष्ााü अनुमान लगाया जा सकता है।

हम उन पद्धतियों पर संक्षिप्त में विचार करेंगे जिसका ऋषि-मुनियों ने वर्षा का अनुमान लगाने में प्रयोग किया है।

सप्तऩाडी चक्र : इस प्रकरण में चार-चार नक्षत्रों की सात नाç़डयों की कल्पना की गई है।

इस पद्धति में प्रथम तीन नाç़डयां याम्य ऩाडी कहलाती हैं। अंतिम तीन ऩाडी सौम्य नाç़डयां कहलाती हैं। प्रथम तीन नाç़डयों में यदि सभी ग्रह हों या अधिकांश ग्रह हो तो ऩाडी से संबंधित फल मिलता है। यदि अधिकांश ग्रह अग्नि या वायु ऩाडी में स्थित हों तो वर्षा कम होने के अवसर होते हैं। यदि सौम्य नाç़डयों में जलदायक ग्रह जैसे बुध, शुक्र या चन्द्रमा स्थित हों तो ऩाडी सफल होकर वर्षा देने वाली बन जाती है। वर्षाकाल में यदि ऩाडी का स्वामी ऩाडी में हो और अन्य जलदायक ग्रह उसमें हों तो वर्षा की संभावना बढ़ जाती है तथा अधिकांश सौम्य ग्रह उस ऩाडी में स्थित हों तथा पापग्रह भी उसमें हो तो भी ऩाडी सफल मानी जाएगी और वर्षाकारक हो जाएगी। यदि प्रत्यक्ष में बादल दिख रहे हों, परंतु चंड, वायु या अग्नि ऩाडी में सब ग्रह हों तो वर्षा नहीं होने देंगे। शुक्र, बुध का उदय-अस्त या वक्री होना वर्षा को प्रेरित करता है। यदि जलदायक ग्रह शुक्र और बुध के बीच में सूर्य हों तो जल का शोषण कर लेते हैं और वर्षा नहीं होने देते। इस वर्ष जुलाई की अपेक्षा अगस्त माह में वह भी प्रथम दो सप्ताहों में सौम्य नाç़डयां सफल होने की बहुत अधिक आशा है क्योंकि वर्षा के अनुकूल परिस्थितियां बन रही हैं।

रोहिणी वास - मेष संक्रांति के दिन जो नक्षत्र हो उससे प्रारंभ करके दो नक्षत्र समुद्र में, दो नक्षत्र तट में, दो नक्षत्र संधि में और एक नक्षत्र पर्वत पर स्थापित करें। सामने पृष्ठ पर दिखाए गए चित्र के अनुसार कुल मिलाकर 8 नक्षत्र समुद्र में, 8 नक्षत्र तट पर, 8 नक्षत्र संधि पर और चार नक्षत्र पर्वत पर स्थित पाए जाएंगे। इस गणना में अभिजित नक्षत्र को शामिल किया गया है। इस चक्र का चित्र बनाने के बाद मेष संक्रांति के दिन अर्थात जिस दिन, जिस क्षण सूर्य मेष राशि में प्रवेश करें उस नक्षत्र से गणना शुरू करें और जहां रोहिणी नक्षत्र आ जाए, वहां रूक जाएं। रोहिणी समुद्र में हैं या तट पर हैं या संधि पर हैं या पर्वत पर हैं, इनके विशेष फल मिलते हैं। यदि समुद्र में रोहिणी वास हों तो अत्यधिक वर्षा होती है, यदि रोहिणी तट पर हो तो पर्याप्त वर्षा होती है। यदि रोहिणी पर्वत पर हो तो अकाल प़डता है और यदि रोहिणी संधि पर हो तो खंडवृष्टि होती है अर्थात कहीं वर्षा होती है, कहीं नहीं। कभी ज्यादा होती है, कभी कम। इसे अभिव्यक्त करने का एक तरीका प्राचीन मनीषियों ने निकाल रखा है। रोहिणी यदि समुद्र में स्थित हों तो माली के घर में वास करती है। इसका अर्थ यह है कि अत्यधिक वर्षा के कारण माली प्रभृत्ति वर्ग के घर में वास करती है और उसे आर्थिक लाभ होंगे। इसका भावार्थ यह है कि सामान्य कृषि उत्पादनों की अपेक्षा कैश-क्रॉप्स या जायद रबी या जायद खरीफ की फसलें अर्थात दो मुख्य फसलों के बीच की अवधि की फसलें अर्थात नकदी फसलें भी अत्यधिक मात्रा में होंगी और लाभ होगा। माली का संबंध कृषक वर्ग से है और इन वर्गो को भारी लाभ होगा जब रोहिणी समुद्र में हों। रोहिणी यदि तट पर हो तो धोबी के घर वास करती है। इसका अर्थ यह है कि निरंतर वर्षा होने के कारण सूर्य के दर्शन कई दिनों में होंगे और कप़डे भी जल्दी से नहीं सूख पाएंगे जिसके कारण धोबी प्रभृत्ति वर्गो को लाभ होगा। ऋषियों ने संकेतार्थ लिख दिए हैं, इसका अर्थ यह नहीं है कि केवल धोबी को लाभ होगा। अत्यधिक वर्षा के कारण इस वर्ग के मजदूरों के श्रम की महत्ता बढ़ जाएगी और उन्हें आर्थिक लाभ होगा। हम सब जानते हैं कि जब कप़डे नहीं सूखते तो धोबी प्रेस करके सुखा देते हैं। जब रोहिणी संधि पर स्थित हों तो उसका वास वैश्य के घर होता है। खंडवृष्टि होने पर कहीं पर फसल होती हैं, कहीं पर नहीं। जब ऎसी स्थिति हो तो इसका लाभ हमेशा वैश्य को मिलता है। क्योंकि विभिन्न क्षेत्रों में फसलों के असमान उत्पादन के कारण फसलों के भाव में अंतर मिलता है और वैश्य उसका तुरंत लाभ उठाता है। जमाखोरी, कृत्रिम अभाव व कालाबाजारी तथा सामान्य रूप से आढ़त वैश्य के उपकरण हैं, जिनसे वह अर्थोपार्जन करता है। जब रोहिणी पर्वत पर हों तो वर्षा नहीं होती और उस क्षेत्र में अकाल प़ड सकता है। इसके कारण अपराध बढ़ सकते हैं व महंगाई व मृत्युदर भी बढ़ सकती है। आषाढ़ कृष्ण और आषाढ़ शुक्ल पक्ष में जब चंद्रमा रोहिणी पर हो तो वर्षादायक होते हैं। विशेषतौर से आषाढ़ में सोमवार की रोहिणी को श्रावण और भाद्रपद के लिए वर्षादायक माना गया है। इसके कुछ अन्य पहलुओं पर आगे चर्चा की जाएगी।

रोहिणी इस वर्ष तट पर है और अच्छी वर्षा के संकेत हैं। एक अन्य बात इस वर्ष यह हुई है कि मानसून अधिक गर्मी के कारण जल्दी आ गई है। इससे वर्षा आने का शास्त्रीय दृष्टिकोण थो़डा प्रभावित हो गया है और ऎसा लगने लग गया है कि सावन और भादो अच्छे नहीं जाएंगे, परंतु यदि एक अन्य मत से विचार करें तो ऎसा प्रतीत होता है कि वर्षा अच्छी होगी। आइए इस पद्धति पर भी विचार करें- नक्षत्रों की निम्न श्रेणियां एक पद्धति के अंतर्गत आते हैं।

स्त्री नक्षत्र : 1. आद्राü 2. पुनर्वसु 3. पुष्य 4. आश्लेषा 5. मघा, 6. पूर्वाफाल्गुनी 7. उत्तराफाल्गुनी 8. हस्त 9. चित्रा 10. स्वाति।

पुरूष नक्षत्र : 1. मूल 2. पूर्वाषाढ़ा 3. उत्तराषाढा 4. श्रवण 5. धनिष्ठा 6. शतभिषा 7. पूर्वाभाद्रपद 8. उत्तराभाद्रपद 9. रेवती 10. अश्विनी 11. भरणी 12. कृत्तिका 13. रोहणी 14. मृगशिरा

नपुसंक नक्षत्र : 1. विशाखा 2. अनुराधा 3. ज्येष्ठा

एक अन्य पद्धति के अनुसार :-

चन्द्र नक्षत्र : अश्विनी, भरणी, कृत्तिका, आद्राü, पुनर्वसु, पुष्य, आश्लेषा, मघा, पूर्वाषाढ़ा, उत्तराषाढ़ा, श्रवण, धनिष्ठा, रेवती, पूर्वाभाद्रपद।

सूर्य नक्षत्र : रोहिणी, मृगशिरा, पूर्वाफाल्गुनी, उत्तराफाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाति, विशाखा, अनुराधा, ज्येष्ठा, मूल, शतभिषा, उत्तराभाद्रपद। उपरोक्त दो पद्धतियों में यदि सूर्य स्त्री नक्षत्र में हो और चंद्र पुरूष नक्षत्र में हो तो वर्षादायक होते हैं। स्त्री नक्षत्र + स्त्री नक्षत्र एवं सूर्य नक्षत्र + सूर्य नक्षत्र वर्षा नहीं देते। जब सूर्य और चंद्र में से एक स्त्री मेे और एक पुरूष नक्षत्र में हो तो वर्षा होती है। उपरोक्त में से द्वितीय पद्धति में सूर्य चंद्र नक्षत्र में हो और सूर्य चंद्र नक्षत्र में हो तो वर्षा होती है। सूर्य सूर्य नक्षत्र में हो तो सूखा प़डे और चंद्रमा चंद्रमा नक्षत्र में हो तो भी सफल नहीं होता है। सूर्य नपुंसक एवं चंद्रमा नपुंसक नक्षत्र में हो तो भी अनावृष्टि होती है। अर्द्धरात्रि के बाद इन ग्रहों का नक्षत्र प्रवेश हो तो अधिक फलदायक होता है।

ग्रहों की गति के आधार पर वर्षा : बुध व शुक्र उदय और अस्त होते समय वर्षा करते हैं। वक्री ग्रह भी वर्षा करते हैं। अभी गत मास में मंगल धनु राशि में स्थित थे तो भयानक गर्मी प़डी और जिस दिन वे वक्री हुए तापमान एकदम गिर गया और एक-दो दिन बाद बादल आ गए। मानसून भी जल्दी आ गया और देश के कई भागों में समय पूर्व वर्षा हुई। वर्षा के मौसम में मैंने बहुत देखा है कि बुध वक्री हुए और कुछ घंटों बाद ही आसमान में बादल घिर आए। शनि भी उदय, अस्त और वक्री होते समय वर्षा के कारक होते हैं। शनि और मंगल राशि परिवर्तन के समय अत्यंत प्रभावी होकर वर्षा कराते हैं।

सूर्य : सूर्य जब रेवती नक्षत्र में हो तो वर्षा और ताप उत्पन्न करते हैं। अश्विनी नक्षत्र में जब सूर्य हो तो वर्षा शुभ नहीं मानी जाती और फसल का नुकसान करती है। जब सूर्य भरणी नक्षत्र में हो तब अगर वर्षा आ जाए तो आगामी मौसम में गर्मी अधिक प़डती है और अन्न का नाश होता है। सूर्य जब कृत्तिका नक्षत्र में हो, उस समय पूरे 13 दिन सुरक्षित चले जाएं और वर्षा नहीं हो तो वर्षा का मौसम बहुत अच्छा जाता है। रोहिणी नक्षत्र में जब सूर्य हो तब केवल बादल गरजें और वर्षा नहीं हो तो 2 महीने बाद वर्षा का मौसम बहुत अच्छा जाता है। मृगशिरा में जब सूर्य हों और तब सूखा चला जाए तो वर्षा बहुत अच्छी होती है और संपूर्ण चातुर्मास अच्छा जाता है। कृत्तिका के बाद वाले नक्षत्रों में सूर्य अप्रैल व बाद में ही रहते हैं और आसन्न वर्षाकाल को प्रभावित करते हैं।

आगामी वर्षाकाल : इस लेख संबंधी जानकारी तो अगले अंक में भी दी जाती रहेगी, परन्तु अब तक जिन पद्धतियों पर चर्चा की गई है, उनके आधार पर यह भविष्यवाणी की जा सकती है :-

1. 20-22 जुलाई के आसपास वर्षा होगी।

2. अगस्त के प्रथम सप्ताह व द्वितीय सप्ताह में सप्तऩाडी चक्र की सौम्य नाç़डयां जलदायक ग्रहों से तृप्त रहेंगी, जिसके कारण भारी वर्षा के योग हैं। समुद्र तटों पर भारी वर्षा, समुद्री तूफान व जन-धन हानि तथा अंदरूनी आबादी क्षेत्रों में कई स्थानों पर बाढ़ व जल प्लावन के दृश्य उपस्थित होंगे, जिससे मनुष्य, जानवर और संपत्ति की भारी हानि होगी।

3. रोहिणी वास तट पर होने से सामान्यत: वर्षा अच्छी होगी परंतु खंडवृष्टि होने के कारण वैश्य वर्ग को अपरिमित लाभ होगा और कृत्रिम जमाखोरी की प्रवृत्तियां दिखाई देंगी और सरकारी कार्यवाहियां बढ़ेंगी।

4. सावन की बजाय भादौं में अधिक वर्षा होगी।

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